कथाकार

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धृतराष्ट्र और शिखंडी-नज़्म


धृतराष्ट्र और शिखंडी 


औरत को पता होता है संसार के सभी 
वस्तुओं को वापस लाने का तरीका।

यमराज से अपने प्रियतम का प्राण वापस ले आयीं थी सावित्री।
किन्तु मर्यादा पुरुष राम, सीता को पृथ्वी में जाने से नहीं रोक पाए थे। 

वो सभी पुरुष जो स्त्री को दूर जाने से नहीं रोक पाए, 
वो या तो धृतराष्ट्र है या शिखंडी !

सिपहिया


महुआ : ( उम्र करीब ३२ वर्ष, गोरा रंग, लाल रंग की चितकबरा साड़ी पहने हुए ) 
गौरी काकी : (उम्र ६५ वर्ष करीब,गोरा रंग, मध्यम पिले रंग की साड़ी पहने हुए )
पर्दा उठता है (गौरी काकी आती है महुआ के बगल में बैठती हैं) 

महुआ : गौरी काकी आज कैसे याद आ गया इस अभागिन कि आप तो रास्ता ही भूल गए हमारे घर के। 

गौरी काकी : अब का बताई दुल्हिन घर में एतना काम था की तनिको फ़ुर्सत न मिला।सिपहिया के कउनो खबर                      मिली?
महुआ : नहीं काकी, कोनो ख़ोज-खबर नहीं, अब तो उम्मीद भी टूटने लगी है!

गौरी काकी : उम्मीद नहीं छोड़ते दुल्हिन, हमका पूरा विश्वास है की रामप्रताप लौट के जरूर आवेगा। 

महुआ : केतना खुश थे १ महीना पहिले जब हम बताये थे की पेट से है हम, छुट्टी भी मंजूर हो गया था उनका घर आने वाले थे पर पता नहीं विधाता को का मंजूर था!

गौरी काकी : चिंता न करो दुल्हिन सब ठीक हो जायेगा, भगवान के घर देर है अंधेर नहीं।हमका तो गुस्सा आवत रही सरकारी अफसर पर एक महीना से रामप्रतापबा बॉर्डर से गायब हुए रहा कौऊनो अफसर तोहार घर के सुधि लिए न आयल रही, मीडियन (मिडिया) वालन भी खबर एके बार चला के छोर दियहिं।

महुआ :"पिया के आस लगावे अंखिया लोराई, लीहें न कोनो सुधि न दिहेन हरजाई "
गौरी काकी :"मुन्ना जे बरका होई तो उनका बताई, सिपहिया बनके न आपन जिनगी बिताई "

गौरी काकी : दुल्हिन तोहार पेट से जे लल्ला हुवे ओकरा सिपाही कबहो न बनाई।

महुआ : काकी, लेकिन लल्ला तो अबहीं से पेट में सिपाही के जइसन लात चलावेला (लेफ्ट-राइट,लेफ्ट-राइट)(हँसते हुए बोलती है), काकी लल्ला बरका होके सिपाही ही बनेला, उनकर इहे इक्क्षा रहेला।

गौरी काकी : हम  निकल रहनी तू अपन ख्याल रखियह दुल्हिन।

पर्दा गिरता है 

खुले बालों वाली लड़कियाँ-कविता


खुले बालों वाली लड़कियाँ


गुलाब, चमेली पर लिखी कविताओं
को नसीब नहीं होती
प्रेम में पड़ी हुई लड़कियों की जूड़े में लगना।

वो कविताएं मँडराती रहती हैं
लड़कियों के माथे के आस-पास और
कुछ दूरी से चूक जाती हैं, जूड़े में लगने से।

या उन कविताओं को पढ़ रही होती हैं,
खुले बालों वाली लड़कियाँ।

तस्वीर -कविता


तस्वीर -कविता 

कुछ तस्वीरें वीरान पड़े दीवार 
पर इसलिए टाँग कर छोड़ दी
जाती है ताकि दीवारों के देख
न पाने का मज़ाक बनता रहे।

कुछ मोहब्बत दीवार पर
टँगी तस्वीर जैसी होती है! 
जिसमें प्रेमी-प्रेमिका अपने 
यादों की तस्वीर को एक-दूसरे
के दिल में टाँग कर, छोड़ जाते हैं।

यादों को क़ैद रखना
प्रेम को हास्यास्पद बनाता है !

तुम और रेलगाड़ी -कविता


तुम और रेलगाड़ी 

तुम देखना मुझे गुज़रते हुए ट्रेन की खिड़कियों से
मैं खाली पड़ी ट्रेन की एक उदास बोगी कि तरह
कहीं स्टेशन पर बैठा मिलूँगा।

तुम देखना जैसे पत्थर दबा होता हैं पटरियों के नीचे
वैसे ही मेरे सीने में दबा हुआ है तुम्हारी कई यादें।

तुम देखना तुम्हारा हाथ थामे युवक ट्रेन की शोर से
हाथ छोड़ मूँद लेगा अपना कान।
तुम देखना उसी शोर में मैं तुम्हारी धड़कन सुन लूँगा 
जैसे स्टेशन पर खाली पड़ी एक बोगी 
हर रोज सुन लेता है गुज़रते हुए इंजन की धड़कन।

तुम देखना ध्यान से एक खाली पड़ी ट्रेन की बोगी 
एक उदास प्रेमी जैसा दिखता है। 

मौसम-कविता


मौसम


आषाढ़ के महीने में

जैसे मेंढकी की गीत

जेठ की दुपहरी में
बाँहें फैलाये जैसे बरगद की छाँह

पूस की रात में
जैसे गरम थपकियों की नींद

लड़कियाँ न जाने कितने 
ही मौसम बन के आती है
लड़कों की ज़िंदगी में!

लड़कियाँ प्रतीक्षा में रहती हैं
लड़कों का मौसम बन के आने का
किन्तु लड़कों का ह्रदय निष्ठुर हो चुका
होता हैं और वो लिखते
रहते हैं मौसम पर कोई कविता।

लड़कों, कभी तुम्हें लू लगे या 
तुम्हारे शरीर पर वज्रपात गिरे,
तुम महसूस करना मौसम के सभी
वेदनाओं को वैसे ही
जैसे लड़कियाँ अकेली उन
मौसमों में गुज़ारती थी अपने दिन।

कमाने गए लड़के - कविता

कमाने गए लड़के - कविता 


शहर को अलविदा करते हुए
तुम्हारे साथ बिताए सारे लम्हों 
को गठरी में बाँध ली है।

मैं उन यादों की गठरी को
गाँव के स्टेशन पर खोल दूँगा।

शहर जाते हुए लड़के
उन यादों को देखे और
समझ लें की शहर से 

गठरी में मिठाइयाँ लाई जाती हैं।
नाकाम इश्क़ की यादें नहीं !

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