कथाकार

Follow me on

गाय (लक्ष्मी) के लिए

"लक्ष्मी" की विदाई हो गई आज। माँ गाय को "लक्ष्मी" कहकर पुकारती थी। पापा के अस्वस्थ होने के बाद उसकी अच्छे से देखभाल नहीं हो पा रही थी, इसलिए हमने उसे अपने हजामिन के हाथों बेच दिया।

माँ रो-रोकर बताए जा रही थी कि आँगन सूना हो गया, चली गई "लक्ष्मी"। मन पसीज गया, अंदर से रुआँसा हो चुका हूँ।

ऐसे कभी सोचा नहीं था कि गाय हमारे खूँटे पर नहीं रहेगी। दोनों बहनों की विदाई पर जो अंतर्मन में दुःख हुआ था, आज उसी को महसूस कर रहा हूँ।

जब मैं 8 साल का था, तब राखी के दिन पुरानी गाय से एक बछिया हुई थी। उसे राखी बाँधकर हमने फोटो खिंचवाई थी। जब राखी हादसे में चली गई थी, तब रो-रोकर बेहाल हो गए थे। राखी के बाद उसकी जगह लक्ष्मी ने ली। वह हमारे दुःख-सुख की बराबर की साझीदार थी। जब बारिश में घर में पानी टपकता, तब वह भी हमारे साथ भीगती थी। कभी-कभार साथ भूखे भी रहे।

पापा के बीमार हो जाने पर मार्च में सौभाग्य से 2-3 दिन उसकी सेवा करने का मौका मिला। पापा-माँ के बाद मैं ही उसे संभाल सकता था। मजाल है कि उसके पास कोई चला जाए। आम गायों की तरह खुले में चरने नहीं जाती थी। कभी-कभार अगर उसका मन बहलाने का होता, तो रस्सी तोड़कर पूरे टोले में उधम मचा आती।

उसके खाने-बैठने की जगह के आसपास कोई रुकावट उसे बर्दाश्त नहीं थी। जो भी सामान मिलता, तोड़ देती। तोड़फोड़ करने पर पिटती भी थी कभी-कभी। पापा की आवाज़ को दूर से पहचान लेती थी और चिघाड़ने लगती थी। ऐसा कोई दिन नहीं था जब पहली रोटी उसे न दी गई हो। भोज-त्योहार में उसके लिए सब्जियों के छिलके लाना एक जिम्मेदारी रहती थी। नाद में जो भी रख देते, उसे ना-नुकुर किये खा लेती थी।

जब पेट खाली रहता, तो नाद के चारों ओर चक्कर लगाती। पेट भर जाता, तो बैठकर जुगाली करती। बिना बोले हमारा उससे संवाद होता रहता था।

माँ को हमेशा उसकी चिंता लगी रहती थी-कभी उसके चारे को लेकर, कभी उसके रहने के घर को लेकर। तभी तो हमने पहले उसके रहने के लिए घर बनाया, फिर अपने रहने के लिए। कई महीने पहले से पुआल-भूसा खरीदने, रखने और खत्म होने के बाद तक का इंतज़ाम करके रखना पड़ता था।

कभी-कभार रात को बछड़ा खुलकर उसके पास दूध पीने जाता, तब भी उसे पूरा दूध नहीं पीने देती। सींग से मारकर दूर कर देती ताकि बचा हुआ दूध हम सुबह निकाल सकें। इतना निश्छल प्रेम था उसका।

मार्च -2026 में गाय (लक्ष्मी) के साथ लिया गया तस्वीर 


"इंद्रप्रस्थ के छलिया"


 "इंद्रप्रस्थ के छलिया"

वे सभी लौट आए हैं
सफ़ेद चमकदार क़मीज़ पहने
Image Credit : Nevada Today
धूर्त इरादों के साथ
इंद्रप्रस्थ के मैदान में। 

नए-नए तर्कों और विचारों से
संविधान बचाने की बात करेंगे,
वे हमें सदी के सबसे बुद्धिमान
जनता का दर्जा देंगे,

जबकि संविधान के पन्नों में
जनता के लिए "चतुराई" शब्द का कोई स्थान नहीं।

वे हमारे दाहिने हाथों में हथियार देंगे
और कहेंगे कि हमारे गर्दन को ख़तरा 
हमारे ही बाएँ हाथों से है,

पर जीतने के बाद, हमारी गर्दन को
धर्म, जाति और हिंसा की कठपुतली बना देंगे।

वे हमें उपहार में उधार बाँटेंगे,
हमारी आँखों के सामने मुफ्त की रोटी दिखाएँगे,
पर हमें तीसरी आँख से भविष्य देखना होगा
जो मुफ्त में नहीं मिलता।

वे कपास उगाने का फ़ायदा बताएंगे
पर जीतने पर नायलॉन की क़ीमत बढ़ाएंगे,
शहर और कस्बों को कूड़े का ढेर बनाकर
वे नदियों की सफ़ाई की दलीलें देंगे।

हमारे नेता चुनाव के मैदान में 
सावधान की मुद्रा में खड़े होते हैं,
इस ताक में कि 
जनता ऊँघे,और वे कुर्सी पर बैठ जाएँ।

अगर वे अपनी चालबाजियों से जीत जाते हैं,
तो मेरे पिता के शब्दों में,
दिल्ली में गूँजता रहेगा—
"जाओ रे जनता, नेता को नहीं पहचाना, जो देश चलाएगा!"

㇐ कुन्दन चौधरी 


पुराने दुःख, नया साल

                                         || पुराने दुःख, नया साल ||

हवाओं जितना
अदृश्य नहीं,
न ही सड़कों जितनी लंबी,
और न पहाड़ जितना मजबूत

मेरा दुःख
साल के महीनों जितना अतरंगी,
जो मेरे शरीर को
ज़ख्मी करते हुए
बीत चुका है।

मुझे यकीन है
कि तुम्हारे स्पर्श से
हजार सालों का दुःख दूर हो सकता है,
पुराने दुःख से
मुक्ति मिल सकती है।

परंतु,
सुख की परिकल्पना
सिर्फ एक भ्रमित आश्वासन है।

पुराने दुःख
और गहरे होंगे,
अधिक दुखेंगे
नए साल में।

― कुन्दन चौधरी  

Photo : Kundan Choudhary
Photo : कुन्दन चौधरी
Location : NH 27 ( Silliguri Highway)


|| प्रतीक्षा ||

 

फ़ोटो : कुन्दन चौधरी 
|| प्रतीक्षा ||  


लौट आएगी                                   
उदास दिन
मुस्काता चाँद
अनमने से रास्ते
बेरंग पहाड़, फूलों की गंध
उनका प्रियतम मौसम

मान-मर्यादा
शान-ओ-शौकत
हवाओं में सुरूर
शहर में बारिश
दरिया में उनके फेंके हुए पत्थर
लौट आएगी,

नींद और उबासी
नादानियाँ, बचकानी हठ
उपहार और ख़त

हाथों की छुअन
माथे की चुम्बन
बिंदी, पायल, चूड़ी
उनके सारे श्रृंगार लौट आएगी

एक क्षण के लिए ही
उनके पास लौट आएगी
मेरे साथ गुज़ारा हुआ समय

नहीं लौट पाती
किसी के प्रतीक्षा में
आँखों से सूखे हुए आँसू

― कुन्दन चौधरी


पिताजी का हाथ - कविता


Photo : Google
Photo : Google 


बहुत मुश्किल था
पिताजी का हाथ बनना

उससे भी ज़्यादा कठिन था
उनके हाथों का औज़ार बनना
जिससे वो पाँचों उंगलियों में फँसाकर
फ़सल काटते थे

मैं लिख भी नहीं सकता 
क़लम को पांचों उंगलियों से पकड़ के

सोचता था
किताबों का भार ढोना कठिन था
फिर ख़याल आया 
पिताजी की पीठ वर्षों से 
धूप, वर्षा, मिट्टी का भार ढो रही थी

मैंने देखा
पिताजी का
कुदाल उठाकर
मेरे सपनों से कहीं ज़्यादा भारी था

पिताजी पूरी उम्र 
रेगिस्तान में उगे बबूल के पेड़ बने रहे
उनके छाए में खिल सका
मैं, एक कपास का पौधा।

― कुन्दन चौधरी

महेंद्र सिंह धोनी - एक इंसान से मिलने की ख्वाहिश, कैसे सपना बन जाता है !




१५ साल हो गए आपको देखते हुए, २०११ विश्व कप के बाद दिल में एक अरमान या यूँ कह लीजिये की एक सपना है मेरा आपसे मिलने का।  क्रिकेट की दीवानगी बहुतेरे हर भारतीय वर्ग में मिल जायेगा किन्तु ९० दशक वालों के लिए क्रिकेट एक जूनून है और उस में चिंगारी का काम दादा ने किया और बाक़ी आपने। मैं कितना बड़ा फैन या प्रसंशक हूँ आपका ये मैं भी तय नहीं कर सकता आपके जन्मदिन पर एक छोटा सा मैसेज या एक छोटी सी कविता आपके इंस्टाग्राम और फेसबुक पर हर बार कर देता था। 
कोशिश करता हूँ की आपके व्यक्तित्व का एक छोटा सा हिस्सा अपने ज़िंदगी में ढाल लूँ ,और आपका Quote "I have always believed that process is more important than results" को फॉलो करूं 

आपके रिकॉर्ड, खेलने का तरीका, ट्रॉफी, शांत स्वभाव का जिक्र मैं बिलकुल नहीं करूंगा, ये जगजाहिर है और लगभग सभी भारतीय को पता है। 

कुछ किस्सा जो सच है, मैं यहाँ साझा कर रहा हूँ कि कैसे "एक इंसान से मिलने की ख्वाहिश,सपना बन जाता है "

मेरे एक पडोसी जो रेलवे विभाग " नरकटियागंज " में कार्यरत थे उनका बेटा "सोनू और विक्रम " रांची में आपके मोहल्ले में ही रहकर पढाई कर रहा था और आपके कुछ दोस्तों को जानते भी थे और एकाध-बार आपके साथ क्रिकेट भी खेले हैं जैसा उन्होंने बताया, वो गाँव आये हुए थे और पहला सीजन था आईपीएल का, तो हमारे गाँव के दोस्तों में चर्चा चल रही थी किस टीम को सपोर्ट किया जाये, हम सब ने मुंबई इंडियंस को सपोर्ट करने का मन बना लिया था सचिन सर के टीम में होने के कारण, लकिन ऐन मौके पर उनका चौक पर बहस में आना और आपके बारे में गुणगान सुनाना और हमसब का आप पर लट्टू हो जाना ( पहली बार का अहसास था ये) और फिर हम सब ने चेन्नई सुपरकिंग्स को सपोर्ट करने लगे तब से अभी तक सिलसिला चल रहा है और चलता रहेगा।  

२०११ विश्व कप में चंदा करके प्रोजेक्टर पर मैच देखना, और जीत जाने पर रोना शायद सभी ने इसे महसूस किया था। 

२०१२ में कॉलेज के लिए अपने अंकल कर आंटी के पास मधुबनी में रह रहा था, आईपीएल स्टार्ट हो गया था और रात को चेन्नई का मैच आने वाला था घर में टीवी पर सीरियल चल रहा था, तो बाजार जाकर सड़क पर खड़े होकर पूरा मैच देखा और घर आकर ये झूट बोला की दोस्त के साथ पढ़ रहा था, ( ये झूट कोई बड़ी झूट नहीं थी )  किन्तु हर बार तो ये नहीं बोल सकता था, जिस दिन भी चेन्नई का मैच होना था, गाँव आ जाता था लेकिन गाँव में घर में टीवी था नहीं और अड़ोस - पड़ोस में टीवी थी तो लाइट जाने की समस्या तो फिर दोस्तों के साथ गाँव से लगे हाईवे पर बने लाइन होटल पर सभी मैच देखा करता था। 

दिल्ली में आने के बाद, स्टेडियम में आपको देखने की लालसा थी, न्यूज़ीलैण्ड के साथ कोटला में टी-२० मैच का टिकट कराया और दोस्त के साथ पहुंच गया मैच देखने, पूरे मैच के दौरान लाखों के संख्या में धोनी-धोनी का शोर हो रहा था, उसमें से एक मैं भी था, होर्डिंग लिख के ले गया था " MAHI MAAR RAHA HAI " की शायद आप होर्डिंग पढ़ के एक नजर देख लें ! आप को पहली बार आँखों से देखा और आकर रात भर ख़ुद से बातें की कि आपसे मिलने पर हम क्या-क्या बातें करेंगे। 

दोबारा पहुँचा आपको स्टेडियम में देखने १ November २०१७ को इस उम्मीद में कि नेहरा जी रिटायर्ड होंगे और आप स्टेडियम के राउंड लगाने आओगे तो नजदीक से देख पायेंगे,आवाज लगाने पर शायद आप एक बार मुड़ कर देख लें, इसबार होर्डिंग का आईडिया पीछले २ दिन से बना रहे थे की कुछ क्रिएटिव लिख के ले जायेंगे, दोस्तों ने खूब मजाक भी बनाया, एक शायरी लिखी नेहरा जी के रिटायरमेंट पर, आपने तो नहीं देखा किन्तु कोहली, पंड्या और धवन ने पढ़ा और थम्ब्स अप किया, आप चलते चले गए जैसे मैंने पहले ही सोच लिया था, ये "धोनी " को जानने वाले सोच लेते हैं। 


मैच के दौरान आपके कई फैसलों पर दोस्तों के साथ बहस होता था और मैं आपके लिए सभी  फैसलों में पक्ष में खड़ा होता था, और फैसला सही हो जाने पर, मैच जीत जाने पर दोस्तों से कहता " अब बताओ " से लेकर 
कई अनगिनत यादें और किस्सा जो सिर्फ मैच तक सिमित नहीं रह पाया वो दिल में घर कर गया, आप पर  बायोग्राफी आने से पहले तक हम " महेंद्र सिंह धोनी " को हीरो मान चुके थे और अपने हीरो से मिलने की सपना भला कौन नहीं देखता है ! ....क्रमश:

आपको जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनायें, ईश्वर आपको लम्बी उम्र दें !



बिछड़ना - कविता

Photo : Google
                                                                   बिछड़ जाने का सरल उपाय था
एक-दूसरे के चाहत को
विपरीत दिशा में जा रही
ट्रेनों में छोड़ आयें

हमसे 
अथाह प्रेम करने वाले
नचिकेता की तरह बिछड़ते है
हम वाजश्रवा का किरदार निभा रहे होते हैं।

बिछड़ने के बाद
कहानी और कविता में
तलाशते हैं
एक जीवंत चेहरा 
बिछड़े हुए लोगों की शक्ल में

और हमारी आँखें वीरान हो जाती हैं
उन्हें ढूँढते हुए
जिससे हमें नाराज़ होना था,
बिछड़ना नहीं।
         



                                                                                                   



Latest Update