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बहुत मुश्किल था
पिताजी का हाथ बननाउससे भी ज़्यादा कठिन थाउनके हाथों का औज़ार बननाजिससे वो पाँचों उंगलियों में फँसाकरफ़सल काटते थेमैं लिख भी नहीं सकताक़लम को पांचों उंगलियों से पकड़ केसोचता थाकिताबों का भार ढोना कठिन थाफिर ख़याल आयापिताजी की पीठ वर्षों सेधूप, वर्षा, मिट्टी का भार ढो रही थीमैंने देखापिताजी काकुदाल उठाकरमेरे सपनों से कहीं ज़्यादा भारी थापिताजी पूरी उम्ररेगिस्तान में उगे बबूल के पेड़ बने रहेउनके छाए में खिल सकामैं, एक कपास का पौधा।― कुन्दन चौधरी
" हिंदी कविता, ग़ज़ल, कहानी, का संगम। शब्दों के माध्यम से प्रेम, भावनाओं और कल्पनाओं की दुनिया में आपका स्वागत है।"
पिताजी का हाथ - कविता
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१५ साल हो गए आपको देखते हुए, २०११ विश्व कप के बाद दिल में एक अरमान या यूँ कह लीजिये की एक सपना है मेरा आपसे मिलने का। क्रिकेट की दीवानगी बह...
