कथाकार

Follow me on

Mother's Day - Quote

मातृदिवस

माँ ने,
मुझे सभी विषयों से बोध कराया।
हिंदी, भूगोल, विज्ञान, इतिहास सब सीख चुका था मैं।


मैं नहीं सीख पाया गणित

और माँ के बनाये पाँच रोटी को दो लोगों में बाँटना,

और खुद के हिस्से में शून्य रोटी लेना।


मैं माँ की बनाई रोटी का हिसाब नहीं सीख पाया।






मज़दूर दिवस

मैं एक मजदूर हूँ,कर्म और भाग्य दोनों से। 
ज़लील होना, गाली सुनना मेरा दिनचर्या बन चूका है।
मैं १ मई को अपने एक दिन का तनख्वाह अपने ऊपर खर्च करता हूँ। 
आज मज़दूर दिवस है मैं अपने बक्से से कुछ नोट को गिनकर जेब में रखा। 
मैंने शराब के दुकान का रुख किया दो बोतल शराब खरीदा,नमकीन के कुछ पैकेट खरीदा।
मैं तंबू में आया दोनों बोतलें शराब की पीया।  
मुझे नशे में ख़्याल आया की क्यों न आज वैश्यालय जाया जाये।
लड़खड़ाते कदमो से मैं वहाँ पहुँचा, एक वेश्या के पास गया और जितने पैसे थे मेरे पास मैंने उसे दे दिए। 
वो मुझे एक कमरे में ले गई और पूरी निर्वस्त्र होकर मुझसे कहा,
चल मज़दूरी करना शुरू कर!
ये सुनकर मेरा नशा काफ़ूर हो चूका था और पाँव रुक गए !
मैंने कहा, आज मज़दूर दिवस है और आज के दिन मैं मज़दूरी नहीं करता और मैं चला आया। 
तंबू में वापस आकर सोच रहा था, जिस्मों का मिलन प्रेम नहीं मज़दूरी होता है!!

फ़ोटो : dreamstime.COM 

शायरी - डाकिया



तुम ये न समझना हम तुमसे ख़फ़ा बैठे है
चिट्ठियां  लिख डाली है डाकिया घर बैठे है। 




दंगा - शेर-शायरी


Copyright :कुंदन चौधरी 


फ़ोटो साभार : Google 

ग़ज़ल - इश्क़ का मलाल


एहतियात भी है सवाल भी है!
इश्क़ मतलब का था मलाल भी है।

लुटाता था अशरफ़ीयाँ हुस्न पर,
आज हैसियत मेरा कंगाल भी है।

मैं सोचता हूँ उसके बारे में अब भी,
दिल कमबख्त़ भी है बेहाल भी है।

तुम भी कहाँ सीधे रास्ते पे हो,
आईने के बाद सामने तुम्हारे जाल भी है।

खुद में ही मसरूफ़ रहो दोस्तों,
इश्क़ सुकूँ है तो जी का जंजाल भी है।



कविता - पैदल घर जाते हुए लोग



"पैदल घर जाते हुए लोग" 
कहीं वक़्त न ठहर जाए, तुम ठहर जाओ,
कुछ दिनों की बात है,जहाँ हो वहीं रुक जाओ।

जिन शहरों के लिए तो कल तक ग़रीब एक महामारी,बीमारी थी,
जरूरतें कैसे होंगी पूरी,इसलिए लोगों में तुम्हें रोकने की खुमारी थी।

तुम तो एक रोटी से भी भूख मिटा लेते थे,
कई दिन बिना खाये भी पेट को मना लेते थे।

लोगों की रहम तो तब जागी है जब तुम सड़क पे उतर आये हो,
वो भूख की बातें कर रहे जो महीनों की राशन पहले ख़रीद आये हो।

तुम्हारे लिए सरकार के पास भी धन नहीं है,
तुम पैदल जाओ अपने घर, जेट में ईंधन नहीं है।

तुम जो लौटोगे कल इस शहर में, तुम्हारा कोई तलबगार न होगा,
कल भी बातें करते थे ग़रीबी की, आज भी कोई मददगार न होगा।

Latest Update