कथाकार

Follow me on

कश्मीर की कली - नज़्म


कश्मीर की कली 


हसरतें अभी कुछ नहीं ,
नींद से भौचंक उठा  ,
सपनों में एक वाक़या हुआ ,
उस दिन काले बुर्के में ,
ग़ुलाब वाले हाथ,
दो लाल चूड़ियां पहने ,
पत्थर चुन रहीं थी।
मेरे जवानो के लहू
बहाने को।
कैसे मान लूँ ?
कश्मीर नायब हैं !
खूबसूरत है !!

घटी के मोहतरमा ,
आप इश्क़ करना सिख लो ,
हम बेवफ़ाई का दर्द झेल लेंगे ,
अब पत्थर का दर्द चुभता है।


पुलवामा अटैक- शायरी



पुलवामा अटैक में शाहदत को प्राप्त हुए सभी वीरों को " इनफिनिट वर्ड " के और से भावपूर्ण श्रद्धांजलि !!
दिलासा मायने नहीं रखते जब ऐसे हमले होते हैं। 
हमें सबक सिखाना होगा उन कायरों को जो ,
अपने कायराना हरकतों से बाज नहीं आ रहे 
उनके जड़ों को ख़त्म करने का समय आ गया है। 



हयात-ए-इश्क़



और फ़िर मोहब्बत वाला दिन ढल गया ,
हयात - ए - इश्क़ दिल से निकल गया। 





इश्क़ और ख्वाब


जो सेतु बनाया है , इश्क़ में तेरे ,
चलके कभी आना , तू ख्वाब में मेरे। 





इश्क़ और सूली


सूली पर लटकना चाहता है ,
दिल शायद इश्क़ करना चाहता है।  




मुल्क़ आज़ाद क्यों हुआ !

अपने राहों में ही ठोकरें ,
अपने पावँ में ही छाले,
दवा दुकानों में फिर, इज़ाद क्यों हुआ,
ये मुल्क आज़ाद क्यों हुआ !

चूमने को ओंठ, खुले हैं,
बोलने को, लब बंद है,
आज़ादी फ़िज़ा में आबाद क्यों हुआ,
ये मुल्क़ आजद क्यों हुआ !

सब में जवानियाँ हैं बराबर के,
कुछ मर रहे देश के लकीरों पे,
कुछ इश्क़ में बर्बाद क्यों हुआ,
ये मुल्क़ आजद क्यों हुआ !

हवा पे पाबंदी कहाँ,
गीता औऱ कुरान में,
एक सा धड़कता है दिल,
तिरंगों की गान में,
फिर धर्म का फ़साद क्यों हुआ,
ये मुल्क़ आजद क्यों हुआ !

-------------------------------------------------------------------
शब्दार्थ :-

देश की लक़ीर = बॉर्डर
चूमने को ओंठ = धारा 377

ख़बर अख़बार की




अख़बार की सच्चाई 



Latest Update