कथाकार

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पद्ममावत-द चैप्टर

*सहसा ही ये दो ऐतहासिक कथा मन मे उभर आया - l)रामायण में सीता का हरण के बाद का युद्ध
ll)महाभारत में द्रौपदी के चिर हरण के बाद का युद्ध - महज़ एक युद्ध नही था! सीख था जो इतिहास के माध्यम से हमें सीखने को मिला । रामायण वाले कथा में सीता माता पवित्र थी , रावण ने हाथ भी नही लगाया था फिर भी राम ने युद्ध किया इतिहास लिखने के लिए की नारी का अपमान ही बहुत बड़ा कारण होता है विनाश के लिए,महाभारत की कथा में भगवान के सामने द्रौपदी के चीर हरण हुआ ,जो एक बरे नरसंहार का कारण बना, अब दोनों कथा को कलयुग से जोड़ते है-पहले वाले कथा को हम यूँ कहें कि किसी नारी के अस्मिता से खिलवाड़ करना कल भी गुनाह था, आज भी है चाहे वो इतिहास के साक्ष्य से हुआ हो या अफवाहों से हो रहा हो ,तर्कसंगत की बात ये है जो भी लोग,संस्था,राज्य,समूह पद्मावती सिनेमा में दावा कर रहे है कि कहानी में छेड़छाड़ किया गया है , उनका दावा एक बिंदु पे सही है अपितु ये दावा सांस्कृतिक इतिहास को ध्यान में रखकर किया गया हो न कि व्यकितगत और सामूहिक लाभ के लिए।किसी भी फ़्लिमकार को कतई ये अधिकार नही है कि कोई भी ऐतिहासिक,धार्मिक,व्यक्तिगत घटनाओं को तोड़मरोड़ कर लोगों के सामने पेश करे । फ़िल्म के रिलीज को लेकर जो तनावपूर्ण स्तिथि बना है ,जो तोड़फोड़,आगज़नी हुआ है और जो हो रहा है उससे क्या ये नही लगता कि हम उस व्यपारी के लिये लड़ रहे है जो अपने 200-300 करोड़ के निजी फायदे के लिए ये सब नाटक को तूल दे रहा है, क्या हो जाएगा अगर एक और फ़िल्म बैन हो जाये ,उन लोगों के लिए अपना ईगो दावँ पे लगाए जो किसी आतंकवाद के फाँसी के माफिनामों पे सिग्नेचर करने से भी नही हिचकते,खैर, लगभग 39 फ़िल्म बैन हो चुका है , तब हमारा ये फ़िल्मभक्ति जागृत नहीं हुआ था , सच तो ये है कि हम अपने ईगो से लड़ रहे है जिसमे किसी भी हाल में जितना है ,वो भी बिना किसी नजरिये से सोचे हुए, एक मिनट सोच के देखा जाए तो जो फ़साद इस सिनेमा से जन्म लिया है उसके बली कोई 200 करोड़ कमाने वाला नही हम जैसे ही बेरोजगार होंगे , जो कुछ पैसों के लालच में किसी का कठपुतली बनकर तोड़फोड़-देंगे-फ़साद करंगे ,क्या किसी के जीवन का क़ीमत एक फ़िल्म से बढ़कर है, जिस सेना को 26 जनवरी के परेड में औऱ बॉर्डर पर बिगड़ते हालात में होना चाहिए वो हमें सिनेमाघरों के बाहर हमें पॉपकॉर्न खिलाते दिखेगा।क्या खुद भंसाली को ये मूवी रिलीज न कर के एक इंसानियत का क्लाइमेक्स नहीं दिखाना चाहिए ? ऐसे भी अब हम कौन सा हिंदुस्तान में रहते है -इक ज़मीन है जिसके कुछ देश है -हिंदू, मुसलमान, ऊँची जाती, नीची जाति।तो जब अपने पे आएगा देख लेंगे।
मैं कुंदन हिंदू के ऊंची जाति से है, माफ करना टॉलरेंस का डंका नहीं पीट रहा , बस फख्र हो रहा है बताते हुए तो बता दिया।
"तुम्हें क्या है -मूवी देखो,पॉपकॉर्न के मजे लो , ओर बाहर आके मुझे बोलो - भक्त मैं मूवी देख के आ गया"क्या उखाड़ लिया तुम्हारा रामसेना, हनुमान सेना,फलाना-दिलाना । हाहाहाहा - मुबारक हो तुम्हारा ईगो जीत गया,अब राम वाले कांड पे मिलते है,जब वो भी किसी मूवी में जल्द ही बेवफा मजनूं बन रहा होगा तब तुम हम से टकराना!।
Note-मेरा ना तो भंसाली जी से न ही करनी सेना से जो कल से अखबार में आ रहा है,से लेनादेना है ,इस पोस्ट से दोंनो पक्षों में से किसी को कुछ आहत होता है तो जो उखाड़ना है उखाड़ ले।
महाभारत वाले कथा के बारे में क्या कहूँ रोज़ ही चीर हरण हो रहा है , कभी भरी सभा मे तो कभी रात के अंधेरे में , कभी घर से उठा के तो कभी गाड़ी में खींचकर , दुर्योधन भी बदल गया है और हम सब तो कृष्ण बने ही है , सुबह उठ के गीता का पाठ फेसबुक,इंस्टाग्राम, ट्विटर पे पोस्ट के रूप में  डालते ही है... to be continue....
जय हिंद,जय देश
Note(2)- देश मे सब टुकड़े आ गए (हिंदू,मुस्लिम,ऊँचीजाती,निचलीजाती) पहले ही कहा था अब हिंदुस्तान रहा ही नही।
#Kundan Choudhary©™

एक शाम ऐसी हो


एक शाम ऐसी हो ....
तुम महकती सुबह मेरी और मैं सूरज तुम्हारा
तुम चांदनी रात मेरी और मैं जुगनू तुम्हारा। 

एक शाम ऐसी हो ....
 तुम याद मेरी और मैं एहसास तुम्हारा
तुम गीत मेरी और मैं सरगम तुम्हारा।

एक शाम ऐसी हो ....
तुम मुस्कराहट मेरी और मैं मासूमियत तुम्हारा
तुम साहिल मेरी और मैं किनारा तुम्हारा।

एक शाम ऐसी हो ....
जो इक पल मेरा हो सारी जिंदगी तुम्हारा
जो मनाना मेरा हो और रूठना तुम्हारा।

एक शाम ऐसी हो ....
बादलों का सेहरा मेरा हो बारिश की बूंदें तुम्हारा
 तुम गुलशन की गुल और मैं गुलिस्तां तुम्हारा ।

एक शाम ऐसी हो ....
जो तेरे नाम का एक जाम हो और मैं प्याला तुम्हारा 
बस एक शाम तुम मेरी हो और मैं हर शाम तुम्हारा।

Shayri-20

काफ़िला मेरे मैय्यत में , रहमत काम आई
हुकूमत के खजाने की , रक़म काम न आई,

बाढ़-कहानी

(गाँव में भीषण बाढ़ आया हुआ हैं एक परिवार के लोग शहर जाने की तयारी कर रहे है )आगे पढ़िए...

(सुयश-जयकांत का बेटा)६ साल का एक बच्चा - मम्मी हम कहाँ जा रहे है?
(अभिकान्त-जयकांत का पिता)अधेड़ उम्र करीब ७० वर्ष - बहु एक बार फिर सोच लो!
(त्रिया-जयकांत की पत्नी)- सोच लिया है बाबूजी अब हम नहीं रुकेंगे, पानी ही पानी है पूरे गाँव में। 
जयकांत- त्रिया, एक बार फिर से सोच लो, हम शहर जाके करेंगे क्या ? गाँव के लोग तो यहीं रह रहे है, हालत कैसे भी हो हमसब एकसाथ मिलकर निपट सकते है इससे और भगवान के लिए एक बार तो बाबूजी के बारे में सोच के तो देखो! 
त्रिया- तुम्हें चलना है तो चलो, वरना मेरे रिश्तेदार हैं मुझे रखने के लिए। 
जयकांत -रोते हुए गले लगता है अपने पिता का। 
अभिकान्त- बेटा तुम रो क्यूँ रहे हो? हमसब कुछ ही दिनों में तो वापस आ जायेंगे जब बाढ़ की पानी ख़त्म हो जायेगा अब जा ही रहे हैं तो हँसी ख़ुशी चलो ऐसे आँशु टपकाते हुए नही।
(सामान की ३-४ गठरियों के साथ सभी लोग नदी तट पहुँचते है )
नाविक - नदी पार करना है क्या बाबूजी ? १० टका में छोड़ देता हूँ उस पार , आओ बैठो बाबूजी इससे सस्ता में कोई और न छोड़ेगा।
(सभी नाव में बैठ जाते है )
नाविक - सब बैठ गए, चलें अब?
त्रिया- रुकिए जरा, बाबूजी आप ने पूजा सामग्री की पोटली तो लाया ही नहीं घर से, पूजा कैसे करेंगे शहर में ?जाइये अब जल्दी ले के आ जाइये तब तक नाव रुकी हुई है। 
अभिकान्त - हां बहु अच्छा याद दिलाया मैं अभी ले के आया।
त्रिया-चलो भैया नाव चलाओ। 
नाविक - लेक़िन बहुरानी बाबूजी आएंगे तब तो चलेंगे।
त्रिया - नहीं बाबूजी हमारे साथ नहीं आ रहे !आपको पार कराना है तो पार कराओ नदी नहीं तो हम दुसरा कोई नाव ढूंढते हैं। 
नाविक- नाव को खेवते हुए आगे बढ़ जाता है। 
(जयकांत नाव पे बैठे हुए मौन है, आज नदी में कई रिश्ते बह रहे थे )
कुछ देर बाद अभिकान्त नदी तट पर पहुँचता है और वहां के नाविक से पूछता हैं -भैया, यहीं नाव पे मेरा बहु,बेटा, पोता था कहाँ गये पता है आपको ? कोई बताओ कहाँ गए सब? बोलो..!(कुछ देर इंतज़ार के बाद आँख से आँशु पोंछते हुए हाथ में पूजा की 
पोटली लिए घर की और चल दिए) 
फ़ोटो : Google 

Shayri-19

हसरत सब की ग़ुलाब हो ऐसा मुनासिब तो नहीं।
कलम महबूब लिखें, हाथ सबके यहाँ ग़ालिब तो नही।

Shayri-18

इक फ़िक्र क्या बढ़ी मेरी हस्ती में !?
उम्र के तानों ने बुढ़ा कर दिया !

Shayri-17

लाखों तोहमतें हैं मेरे मुक़ाबिल के ,
इक़्तिज़ा है , किसी सजा का।

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